Monday, October 26, 2009
सामंतों के आगे घुटने टेके नीतीश सरकार ने
आखिरकार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने द्विज सामंतों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। उन्होंने देवव्रत मुखोपाध्याय की अध्यक्षता वाले भूमि सुधार आयोग की सिफारिशों को लागू करने से साफ मना कर दिया है। आयोग ने बिहार में भूमि संबंधों में व्यापक परिवर्तन की वकालत करते हुए नया बटाईदारी कानून लाने की सलाह दी थी। इस कानून के बनने से बिहार में सामंतों और वंचितों की सामाजिक-आर्थिक हैसियत में परिवर्तन आता और जातीय नरसंहारों के सिलसिले का भी स्थायी समाधान हो जाता।
आयोग की रिपोर्ट को लंबे समय तक दबाये रखा गया। बाद में कुछ विधानसभा सीटों के उपचुनाव के ऐन पहले विधानमंडल के पटल पर रख कर इसके कुछ अंशों को लागू करने की घोषणा की गयी। नीतीश कुमार की इस घोषणा के साथ ही बिहार के जमींदारों ने आंखें तरेरनी शुरू कर दीं। उनके दबाव में नीतीश कुमार ने रिपोर्ट के अध्ययन के लिए एक प्रशासनिक अधिकारी की अध्यक्षता में कमेटी के गठन की घोषणा की, जिसका काम आयोग की सिफारिशों पर पानी फेरना था। लेकिन बिहार के द्विज जमींदारों को, जिनसे नीतीश कुमार घिरे हैं, भूमि संबंधों में परिवर्तन की बात सुनना भी गवारा नहीं।
वास्तव में, नीतीश कुमार की राजनीति का रंग-ढंग जानने वालों को उस समय भी आश्चर्य हुआ था, जब उन्होंने भूमि सुधार आयोग की सिफारिशों को लागू करने घोषणा की थी। नीतीश योग्य लोगों से सलाह-मशविरा पसंद करते हैं लेकिन साहसिक फैसला ले सकने का इतिहास उनका नहीं रहा है। निर्णायक मौकों पर उन्हें सामंतों और विभिन्न प्रकार के धंधेबाजों की अपनी स्थायी टोली की ही बात माननी पड़ती है।
उनके कार्यकाल में गठित मुचकुंद दुबे की अध्यक्षता वाले ‘समान स्कूल प्रणाली आयोग’ की सिफारिशों का हश्र हम देख चुके हैं। किसान आयोग की साहसिक सलाह भी कचरे के डब्बे में फेंकी जा चुकी है। कुछ बड़े परिवर्तन का सुझाव देने वाले अति पिछड़ा वर्ग आयोग को सरकार ने अपनी रिपोर्ट बदल देने के लिए कहा है। इन आयोगों का गठन बहुत धूमधाम से किया गया था और देश के कुछ प्रमुख बौद्घिकों को इनसे जोड़ कर उन्होंने खासी प्रशंसा बटोरी थी। लेकिन अपने-अपने क्षेत्रों में दक्षता रखने वाले इन विशिष्ट लोगों की सलाह मानने का साहस उन्होंने नहीं दिखाया। इसके विपरीत महादलितों की बाबत बिठाये गये आयोग ने जब-जब जिस जाति को महादलित श्रेणी में शामिल करने की सलाह दी, तो उसे तत्काल स्वीकार किया गया। इस आयोग की इन सिफारिशों में सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की संभावना शामिल नहीं थी और दलितों का विभाजन रणवीर सेना और भूमि सेना के सेनापतियों के अनुकूल था। दूसरी ओर रणवीर सेना के राजनीतिक संबंधों की जांच करने वाले अमीर दास आयोग की कोई जरूरत नहीं समझी गयी। उसे बिना रिपोर्ट मांगे ही भंग कर दिया गया।
भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर देना भी इसी की एक कड़ी है। साफ तौर पर कहा जाए तो एक कदम आगे बढ़कर दो कदम पीछे जाने की इस राजनीतिक कवायद से नीतीश कुमार का ढुलमुलपन पूरी तरह उजागर हो गया है। 19 अक्तूबर को उन्होंने साफ कहा कि आयोग की सिफारिशें लागू नहीं की जाएंगी।
बिहार में बड़ी जोतों के मालिक द्विजों के अलावा दबंग पिछड़ी जातियां यादव और अवधिया कुर्मी में भी हैं। लेकिन नीतीश कुमार ने यह बयान द्विज जातियों के दबाव में दिया है। वस्तुत: उनकी पिछड़ा राजनीति शुरू से ही द्विज वर्चस्व का शिकार रही है। इसी कारण वे महिलाओं को आरक्षण देने के अलावा कोई परिवर्तनकारी कदम नहीं उठा सके। उन्होंने उन सभी अवसरों को गंवा दिया, जिसके लिए बिहार के वंचित तबकों ने उन्हें सत्ता सौंपी थी। समानता के आग्रही लोगों के लिए चिंता का विषय यह है कि बिहार के दो अन्य राजनेता लालू प्रसाद और रामविलास पासवान भी इस मामले में ज़मींदारों के पक्ष में खड़े रहे हैं।
नीतीश कुमार के इस फ़ैसले को बेहतरीन रणनीति बताने वालों की भी कमी नहीं है। ऐसे लोगों का मानना है कि अगर नीतीश द्विजों की नाराज़गी मोल लेते हैं, तो अगले साल विधानसभा चुनावों में सत्ता में नहीं लौटेंगे। पिछले दिनों हुए उपचुनावों में नीतीश कुमार को हार का सामना करना पड़ा था। उनकी इस हार को भी भूमि सुधार आयोग का परिणाम बताया गया था। प्रचारित किया गया कि आयोग की रिपोर्ट लागू करने की घोषणा से द्विज जातियां नाराज हो गयी हैं और केवल उनका वोट नहीं मिलने से नीतीश कुमार हार गये हैं। जबकि उपचुनावों में उनकी हार का एक का बड़ा कारण दलितों, जिनकी आबादी बिहार में चौदह फीसद से ज्यादा है, का छिटकना भी था। द्विज वोटों के अलावा पिछड़े मुसलमानों के वोटों का एक बड़ा हिस्सा भी कांग्रेस ने नीतीश कुमार से छीन लिया है।
किसी सरकार का प्राथमिक कार्य ‘न्याय’ करना होता है। सामाजिक और आर्थिक दोनों तरह का न्याय और नौकरशाही के सामने उसके अनुरूप दृष्टिकोण को रखना उसके मुख्य काम हैं। विकास और सुशासन जैसे प्रशासनिक काम नौकरशाही के होते हैं। विधायिका को केवल उसकी अच्छी तरह निगरानी करनी चाहिए। नीतीश कुमार पिछले चार साल के कार्यकाल में अपना प्राथमिक कर्तव्य निभाने में न केवल कोताही बरतते रहे हैं बल्कि उनके कई फैसलों से बिहार के वंचित तबकों के साथ अन्याय हुआ है।
उदाहरण के तौर पर उस महादलितों की बाबत बने आयोग की सिफारिशों को भी देखा जा सकता है, जिन्हें न केवल नीतीश कुमार के संकेत पर तैयार किया जाता रहा बल्कि सरकार उन्हें तत्काल लागू भी करती गयी। आयोग की सिफारिशों पर सरकार ने अपेक्षाकृत अधिक शिक्षित और संपन्न धोबी और पासी जाति को भी महादलित की श्रेणी में डाल दिया, जबकि कम शिक्षा वाले रविदास और दुसाध जाति को महादलित की श्रेणी से बाहर रखा क्योंकि ये दोनों जातियां क्रमश: मायावती और रामविलास पासवान का वोट बैंक मानी जाती हैं।
नीतीश कुमार खुद को कर्पूरी ठाकुर की परंपरा का कहते हैं। कर्पूरी ठाकुर ने 1977 में बिहार में पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण लागू किया था। बाद में उसी की प्रेरणा से राष्ट्रीय स्तर पर मंडल आयोग का गठन हुआ, जिसकी सिफारिशों के सरकारी नौकरियों में आरक्षण वाले हिस्से को वीपी सिंह ने लागू किया। कर्पूरी को अपने इस साहसिक फैसले के कारण मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था। वीपी सिंह का गद्दी गंवाना भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है। क्या हम नीतीश कुमार की तुलना इन नेताओं से कर सकते हैं? लोकतंत्र में सत्ता का अस्थायित्व तो बना ही रहेगा। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि इतिहास के पन्नों में न्याय करने और अन्याय के पक्ष में खड़े होने वाले सत्ताधीशों की जगह अलग-अलग होती है। (जनसत्ता, 22 अक्टूबर 2009 से साभार)
Thursday, June 18, 2009
Drought looms large
Amitabh Ranjan
Magnificent News Production
Patna. Vanshi Singh, a 70-year-old farmer living in one of the villages by the side of southern bank of River Sone, is a hopeless soul and distraught as well. He is fast loosing his hope in this season of Kharif for bumpy crop which he used to reap earlier. Living near Sone is not going to benefit him any more thanks to almost dried up river.
And, at the moment, Vanshi is wondering what if monsoon will too get delayed. He would perhaps nothing but to face complete drought in his large farming area.For him, monsoon is of course a boon to irrigate his farming, but, it is Sone on which he hinges upon all his savings for
the season.
Much to his ill-fate, the river is devoid of water this year to the most part of its length after entering into the border of the state. Apart from cursing fate, he is dismayed that why state government is not taking notice of his predicament and of other cultivators like him.
"They say there is Sushasan (good governance) under Nitish regime but, it has not yet reached to us. And, it will have no effect now as Rohini nakshtra has also been passed off," he makes poignant statement on his state-of-affairs.
"When we ask (officials) about canal water for irrigation purpose they flatly reply that river has no water in its store," he complains.
"We are least bothered by them as it has no meaning to us whether Nitish or Lalu is in rule," Vanshi remarks pungently.
Apart from rain, for decades, Sone has been a sole source of water for irrigation to hundreds of villages located beside it. Ironically and quite contrary to the other time of the year, dried out river has left more than thousand acres of arable land parched and ominous sign of drought is looming large over here. Along with Vanshi, many other farmers of his village including Ajay Singh and Jitendra Singh are also facing similar dilemma and they have pinned their all hopes on the state government to take steps.
However, Jitendra has threatened that farmers would stage demonstration if water problem would not be solved in coming days.
State chief minister Nitish Kumar too has shown sympathy towards farmers but, he blames neighboring states Madhya Pradesh and Uttar Pradesh and defective agreement over Ban Sagar dam project.The Ban Sagar dam was an out come of an agreement signed by three states- Madhya Pradesh, Uttar Pradesh and Bihar- to share the water of Sone.
On Monday, when Nitish was asked about the impending drought in southern part of the state, he alleged that the agreement had not yielded enough quantity of water to Bihars farmers.
"The very agreement was not properly done and it has parched many villages here in the state," he added, "I have just returned from visiting those areas and it is indeed not a good sign."
Nitish said that he had urged the Central government to take stock of the situation without delay.
Saturday, May 9, 2009
क़िस्मत के सांढ़ उर्फ़ देवेगौड़ा उर्फ़ नीतीश कुमार
क़िस्मत के सांढ़। कभी लालू यादव थे आज नीतीश हैं। मुख्यमंत्री तो हैं ही, नीतीश में अब कईयों को प्रधानमंत्री वाला सिंघ भी दिखाई पड़ने लगा है। विशेष तौर पर वामपंथियों को जो अब तक लाल चश्मे से नीतीश को साम्प्रदायिकता को संपोषित करने वाला शख़्स बताया करते थे। नीतीश इनके साथ सबके चहेते राहुल को भी लगता है कि नीतीश बड़ाई के पात्र हैं। माता जी तो पहले ही कुछ मामलों में अपनी शब्द उदारता प्रदर्शित कर चुकी हैं। बेटा जी को भी लगता है कि वोटरों ने आईना दिखा दिया तो बी जे पी की बल्ले बल्ले हो जाएगी। इसलिये बेह्तर है कि नीतीश को थोड़ा पहले ही से टाप के रखा जाये।वैसे ये क्या गज़ब हो रहा है कि नीतीश के क़द को पटना से खींच कर दिल्ली तक कर दिया गया है? पटना में बैठे नीतीश को पटियाने के लिये तमाम लोग राजनीति के चाणक्य बनने को आतुर हैं।
जाने के बा? त तनी दिमगवा पर जोर डालिये और याद कीजिए 1996 का संयुक्त मोर्चा नामक बेदिली से बने दलों के एक समूह को। कांग्रेस को बाहर रखना था, बी जे पी सरकार बनाने में विफल रही थी और ऐसे मौक़े पर देश एक अदद प्रधानमंत्री को तरसता दिख रहा था। इधर –उधर नज़र घूमाते हुए सबकी निगाहें देवेगौड़ा पर टिक गयी थीं। और चाहे अनचाहे या जीभ लपलपाते देवेगौड़ा देश के दक्खन प्रांत से आने वाले पहले प्रधानमंत्री बन गये थे। ये ग्याहरवीं लोक सभा थी। कांग्रेस के पास 136 सीटें थीं, जबकि बी जे पी के खाते में 160। और ऐसे अचकचा देने वाले हालात में देवेगौड़ा को पी एम बनाने में राष्ट्रीय मोर्चे के साथ इसी वाम मोर्चे ने किंग मेकर की भूमिका अदा की थी।
ध्यान से सोंचेंगे तो पंद्रहवीं लोक सभा के गठन के ठीक पहले की पैंतरेबाजी में नीतीश सबके अपने अपने देवेगौड़ा बनते दिख रहे हैं। सबने चुनाव लड़ा है और सरकार बनाने के मौक़े की तलाश में जुगत भिड़ा रहे हैं। लेकिन देश में गठबंधन का फच्चर फंसा हुआ इसलिये एक फेस भी चाहिये। फिलहाल नीतीश से बेहतर पालिश्ड फेस किसका हो सकता है?
ऐसे सुअवसर पर राजनीति के साथ-साथ कुछ गणित का भी ज्ञान हो तो इस समीकरण पर ग़ौर फ़रमाएं -
वाम मोर्चा + क्षेत्रिय दल + देवेगौड़ा – बी जे पी – कांग्रेस = नीतीश कुमार
लेकिन नीतीश इतने ‘वो’ तो हैं नहीं कि आसानी वैसे बन जाएंगे जैसा कि लोग चाहते हैं। प्रधानमंत्री बनने की ललक तो दिखती है मगर सौफिस्टिकेटेड हैं इसलिये पूछे जाने पर सकुचाते हुए प्यार से नकार जाते हैं। वैसे लाल गुरुघंटालों ने जब इतना फ़ेवर कर दिया है तब नीतीश ने भी उनके बाबत अपने सुर-ताल दुरुस्त कर लिये हैं। भले ही मामला न्यूक्लियर डील का हो।
इसलिये नु कहते हैं कि ए नीतीश जी जरा पिछ्वाड़े जा कर बगलगीरो को धन्यवदवा देते आइएगा। काहे से कि न तो उ मैडम के कुनबा से बिगाड़ लेते और न आपके माथे पर ताज सजावे के तैयारी करता सब लोग।
वैसे एगो आकलन ई भी है कि 2009 में 1996 की अपेक्षा हालात बदले हुए हैं। नीतीश मुख्यमंत्री हैं, बड़ी मुश्किल से बड़का भइया को सूबे से बाहर करने में सफ़ल हुए हैं। जानते है कि बड़का कुर्सी में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई तो हाल कहीं ये ना हो जाए कि न तो ख़ुदा मिला न ही विसाले सनम। यानी देवेगौड़ा बन के प्रधानमंत्री बन गये तो देवेगौड़ा वाला ही हाल ना हो जाए। इस लाल सलाम का कोई भरोसा नहीं है। आज सलामी ठोंकी कल ही छौ अंगुर छापने पर लग जाएंगे। याद ही होगा कि देवेगौड़ा 1996 में नौ महीने तक ही टिक पाए थे।
लगे हाथ इस पर भी चर्चा कर लेते हैं कि अगर नीतीश हस्तिनापुर की राजगद्दी पाने की लालसा में या भरोसे में बोरिया बिस्तर समेट लेते हैं तो मगध में ही महाभारत शुरु हो जाएगा। अपनी पार्टी में तो कोई दिखता नहीं है और बी जे पी को टा टा बाय बाय बोला तो दुस्सर दिगदारी शुरु हो जाएगा। 16 महीना बाद बड़का भईया के चांस खुल जाएगा। बी जे पी का समर्थन मिल भी जाता है तो मोदी हड़बड़ाते हुए गद्दी सरिया के संभाल पाएंगे कि नहीं ई भी सोंच के कै गो के माथा दुखाए लगता है।
लेकिन सवाल ये भी है कि लालू जी आजकल हैं कहां? वो भी रहे हैं क़िस्मत के सांढ़ । जब थे तब उनके एक इशारे पर जिन्न निकल आते थे और विरोधी दुम दबा के पतली गली से निकल पड़ते थे। लालू को लगता था, आज नहीं तो कल देश के मुखिया बनिये जाएंगे। तब लालू किस्मत के सांढ़ो थे, साथे-साथे हाथियो थे। सबको बुड़बक बूझ के हड़काते रहते थे। चाहे मुंह बाए खड़े पत्रकार हों या फिर टुकुर-टुकुर ताकने वाले लोग बेचारे। जब लालू चुप सब चुप, जब लालू हंसे सब हंसे। लालू के यहां सबों की क़ीमत सब धान बाइस पसेरी समान थी। 20 साल तक चलता रहा। समय बदल रहा है। लालू के बारे में राय बदल रही है। पता नहीं ये सब देख कर लालू की राय बदल रही है या नहीं। ज्यादा नहीं तो कुछ जायजा 16 मई के बाद मिल जाएगा। लेकिन लालू के एक्के बार में कौन राईट आफ़ कर सकता है? ब्रह्मा जानते होंगे। मिलेंगे तो जरुरे से पूछेंगे।
Post Script: तो बिहार की चांदी होती दिख रही है। यहां दो-दो क़िस्मत के सांढ़ अब हो गये हैं। कौन बनेगा प्रधानमंत्री? हमनियो के दावा है। ठोके में का जाता है।
अमिताभ हिमवान
Wednesday, April 29, 2009
चेन्नई के निकट हुए रेल हादसे में सात लोगों की मौत हो गयी और तक़रीबन बीस यात्री घायल हो गये। ख़बर बनी है भारत में एक और रेल हादसा …इसमें नई बात क्या है, ये तो हादसों का देश है। इतने बड़े देश जिसके भू-भाग में जापान, कोरिया, ब्रिटेन, स्वीडन जैसे कई देश समा जाएं और कोई फ़र्क़ भी ना पड़े ऐसे में किसी एक कोने में सात लोग मारे जायें तो समझो उनके दिन पूरे हो गये थे और वो इहलोक को त्याग कर सांसारिक कष्टों से मुक्त हो गये। लेकिन मान लें कि आपको पता चले कि जिस रेलगाड़ी में आप बैठे हैं उसके चालक के नाम-पता की जानकारी स्वयं रेलवे के बाबुओं को नहीं है। यानी जो चालक, नीतीश जब रेल मिनिस्टर थे तब उन्होनें रेल चालकों को पाइलट नाम दिया था, आपकी रेल पूरी रफ़्तार से दौड़ा रहा है वो कौन है किसी को नहीं मालूम है तब आपकी धड़कनें हादसे से पहले बंद होने के हालात में आ जाएंगी या नहीं। ऐसा ही हुआ होगा कई यात्रियों के साथ बुधवार की सुबह 5 बजे जब चेन्नई के पास मूर रेल काम्प्लेक्स रेलवे स्टेशन से एक लोकल पैसेंजर ट्रेन धड़धड़ाती हुई चल पड़ी लेकिन ड्राइवर वहीं खड़ा रहा। किसी को समझ नहीं आया कि ट्रेन दरअसल चल कैसे पड़ी। इससे पहले कि कुछ किया जा सके काफी देर हो चुकी थी। ट्रेन कुछ किलोमीटर दौड़ कर उपनगरीय इलाके व्यासरपाड़ी जीवा में जाकर एक खड़ी मालगाड़ी से टकरा गयी।
अब हादसा तो हो गया। किसी पर गाज गिरनी ही थी सो असल चालक महोदय जो खुद हतप्रभ थे उन पर एफ़ आई आर दर्ज़ हो गया। लगे हाथ रेल मंत्री और हमारे मैनेजमेंट गुरु लालू यादव ने जांच के आदेश भी दे दिये। ऐसे समय के लिये हमारे यहां की एक रीत है। वो ये कि दुर्घटना चूंकि हो गयी है तब कुछ राजनीति भी होनी चाहिये। सो नीतीश बाबू ने अपने राजनीतिक सखा/ दुश्मन/ बड़े भैया को लपेटा। उन्होनें हमलावार तेवर दिखाते हुए इस घटना के साथ रेलवे की तमाम परेशानियों की जड़ लालू को बता डाला। नीतीश ये भी नहीं भूले कि चुनाव से बेहतर कौन सा वक्त हो सकता है जब अपनी पीठ थपथपाते हुए विरोधी को आड़े हाथों लिया जा सके। सो चढ़ बैठे। कहा कि रेलवे में उनके किये धरे को लालू बर्बाद करने पर तुले हुए हैं। सात लोग की जान निकल गयी लेकिन चुनाव जीतना जरुरी है सो मौके पर मुद्दा मिला है हमले करो। हालांकि ये वही नीतीश हैं जिन्होनें ऐसी ही एक दुर्घटना की नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। लालू भी कम नहीं हैं जांच के आदेश देने तक की जिम्मेवारी निभा ली। अब उनके लिये जरुरी ये था कि तीसरे चरण के मतदान में पहले अपनी जीत सुनिश्चित कर लें और आखिरी दौर के लिये समय का सदुपयोग करते हुए प्रचार में जुट जाएं।
सही भी है मौत जिनकी होनी थी हो गयी। प्राण तो उनके लौटाये जा नहीं सकते सो जो ज़िन्दा हैं कम से कम उनके वोट तो लिये ही जा सकते हैं। प्राण जाये पर वोट ना जाये। अच्छी सिक्वेल बनेगी।
दोस्तों, हादसों के इस देश में राजनीति की पटरी बिछी हुई है। यहां ज़िन्दगी की रेल कब डी रेल हो जाये, हम नहीं जानते ।
अमिताभ हिमवान